कमरों में शराब की खाली बोतलें,

हल्द्वानी: आप सोच रहे होंगे कि सरकारी गेस्ट हाउस में अधिकारी योजनाएं बनाते होंगे विकास की, कल्याण की, सड़क बनाने की या पुलिया जोड़ने की। लेकिन हल्द्वानी के पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस में जो कुछ सामने आया है, वो आपको सोचने पर मजबूर कर देगा कि ये योजनाएं किस चीज़ की बन रही थीं नशे की पार्टी या जनसेवा की रजनीगंधा?
सांसद पहुंचे, दरवाज़ा खुला और सिस्टम की शराबबंदी की सच्चाई बहार आ गई, पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद अजय भट्ट जैसे ही गेस्ट हाउस में दाखिल हुए, वहां का दृश्य देखकर उनके भी होश उड़ गए। कमरों में शराब की खाली बोतलें, सिगरेट के खोखे, ताश की गड्डियां और वो भी एक सरकारी गेस्ट हाउस में! अब ये सोचिए, जहां व्यवस्था की रूपरेखा बननी चाहिए थी, वहां ‘पार्टी का कार्ड चल रहा था’ वो भी असली पार्टी नहीं, ताश वाली पार्टी। नशे के खिलाफ सरकार सख्त है लेकिन सख्ती सिर्फ पोस्टर पर है मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार नशे के खिलाफ अभियान चला रही है। लेकिन जब खुद सरकारी दफ्तर नशे की गिरफ्त में हों, तो अभियान कितने दूर तक जाएगा? सांसद अजय भट्ट ने कुमाऊं कमिश्नर दीपक रावत और पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर पी.एस. बृजवाल को फोन किया नाराज़गी जताई, कार्रवाई की मांग की। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह पहली बार हो रहा है? या पहली बार कोई पकड़ में आया है? सूचना पर तहसीलदार मनीषा बिष्ट मौके पर पहुंचीं, जांच हुई लेकिन क्या यही जांच सिस्टम को साफ़ करेगी? या फिर एक दो नामों की बलि देकर फिर से सब वैसा का वैसा हो जाएगा? एक सरकारी गेस्ट हाउस में इतना खुला नशे का अड्डा वो भी बिना किसी रोक-टोक के ये अपने आप में सवाल है उस सिस्टम पर, जो जिम्मेदारी के नाम पर सिर्फ इमारतें बनाता है, लेकिन संवेदनशीलता नहीं। कुल मिलाकर हल्द्वानी का पीडब्ल्यूडी गेस्ट हाउस सिर्फ एक इमारत नहीं है, वो एक आईना है जिसमें सरकारी तंत्र की वो सच्चाई झलकती है, जिसे देखने की किसी में हिम्मत नहीं होती। सांसद की मौजूदगी से जो परतें खुलीं, वो दिखाती हैं कि नशे के खिलाफ जंग सिर्फ भाषणों में है मैदान में नहीं। ऐसे में सवाल य़ह उठता है कि क्या गेस्ट हाउस की दीवारों पर सिर्फ पेंट की जरूरत है या सिस्टम को ही रीपेंट करने की जरूरत है?

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