पत्रकार, आज समाज में संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।

हल्द्वानी: कभी समाज की नब्ज पर उंगली रखने वाला पत्रकार, आज समाज में संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। एक दौर था, जब पत्रकार अपनी कलम से सत्ता की नींव हिला देते थे। अब वही कलम चुप है, और कैमरे की लाइट सिर्फ ग्लैमर खोज रही है।
समाचार अब “सच्चाई” नहीं, “सेलिब्रेशन” बन गया है। स्टूडियो में बैठे एंकर अब सिर्फ चिल्ला रहे हैं सवाल नहीं पूछ रहे। ज़मीनी सच्चाई से कोसों दूर, सोशल मीडिया पर वायरल होती झूठी ख़बरें समाज को तोड़ रही हैं और पत्रकारिता के मूल्यों को खोखला कर रही हैं।
पत्रकारिता कभी आंदोलन थी। अब प्रमोशन है।
कभी जनहित का औजार थी, अब निजी हित का हथियार।
गाड़ी पर प्रेस लिखाकर नियम-कानून तोड़ना अब बहादुरी नहीं, बेशर्मी की पहचान बन गया है।
हम सब जानते हैं लोकतंत्र की नींव चार स्तंभों पर खड़ी है। जब इन स्तंभों में से एक, यानी मीडिया, खुद ही भ्रष्टाचार के दलदल में धंस जाए तो बाकी तीन को संभालना मुश्किल हो जाता है।
कुछ पत्रकार अब खुद को सवालों से ऊपर समझते हैं।
कुछ कैमरे के सामने नहीं, बल्कि दरवाज़ों के पीछे सौदे करते हैं।
और कुछ तो ऐसे हैं, जो ईमानदारी से काम करने वालों को भी डराने का धंधा करते हैं।
लेकिन हर अंधेरा स्थायी नहीं होता। आज भी कुछ पत्रकार हैं, जो चुपचाप, बिना शोर किए, सच्चाई की मशाल थामे खड़े हैं। उनकी वजह से अब भी उम्मीद ज़िंदा है कि ये चौथा स्तंभ दोबारा मज़बूती से खड़ा हो सकता है।
क्योंकि सवाल पूछना बंद हो जाए, तो जवाब देने वाले राजा हो जाते हैं।

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