नर्मदापुरम / नवदुर्गा में माँ दुर्गा का सातवां रूप माँ कालरात्रि के नाम से जाना जाता है। माँ कालरात्रि का रूप अत्यंत भयानक और उग्र होता है, जो अंधकार के समान काला है, लेकिन वे अपने भक्तों को सभी प्रकार के भय और बाधाओं से मुक्ति दिलाती हैं। पुराणों के अनुसार जब असुर शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में उत्पात मचाया, तब देवताओं ने मां दुर्गा से रक्षा की प्रार्थना की। मां दुर्गा ने अपने शरीर से अग्नि प्रकट की और उस अग्नि से उत्पन्न हुईं मां कालरात्रि। उनकी गर्जना से ही असुरों की सेनाएं भयभीत हो गईं। रक्तबीज नामक असुर का रक्त जैसे ही धरती पर गिरता, वैसे ही नए असुर उत्पन्न हो जाते। तब मां कालरात्रि ने अपने प्रचण्ड रूप से उसे परास्त किया और रक्त की बूंदें धरती पर गिरने से पहले ही पी लीं। इसके बाद उन्होंने शुंभ और निशुंभ का भी संहार किया इसी कारण माँ काल रात्रि को दुष्टों के लिए विनाश की देवी और भक्तों की रक्षक माना जाता है। माँ कालरात्रि का स्वरूप हमें यह सीख देता है कि चाहे अन्धकार कितना भी गहरा क्यों न हो, भक्ति और विश्वास के प्रकाश से उसका अन्त सम्भव है उनका उग्र रूप दर्शाता है कि धर्म और सत्य की रक्षा के लिए अन्याय का विनाश अनिवार्य है। वो नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरी शक्तियों का नाश कर भक्तों को निराशा से बाहर निकालती हैं।मां कालरात्रि गधे पर सवार होकर चार भुजाओं से भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। उनके हाथ में मशाल और तलवार है, जबकि अन्य दो हाथ अभय और वरद मुद्रा में हैं। उनकी तीन आंखें अज्ञानता के अंधकार को ज्ञान और सत्य के प्रकाश से दूर करने का प्रतीक हैं। वे तीन नेत्रों वाली हैं, जो सूर्य, चंद्रमा और अग्नि की तरह समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं।खुले और बिखरे केश मानो आकाश में चमकती बिजली का आभास कराते हैं।गले में अग्नि ज्वालाओं की माला उनकी शक्ति का बोध कराती है।उनकी चार भुजाएं हैं—दाहिने हाथ में अभय और वरद मुद्रा, जबकि बाएं हाथ में वज्र और खड्ग।उनके श्वास और मुख से अग्नि की ज्वालाएं निकलती हैं। उनका वाहन गर्दभ (गधा) है। मां का भयंकर रूप जहाँ असुरों के लिए काल है, वहीं भक्तों के लिए मातृत्व और संरक्षण का अद्वितीय स्वरूप है। माँ का यह कालरात्रि शक्ति स्वरुप भयानक है परन्तु शुभ फलदायी है। (संकलन- प्रीति चौहान)